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Tuesday, November 15, 2011

डॉ आशुतोष वाजपेयी

मित्रों माँ वाणी का स्तवन करते हुए एक घनाक्षरी छंद निवेदित है. स्नेह चाहूँगा

कविवाणी वीणापाणी एक हैं न भेद कोई
यही शब्दशिल्पी महापुरुषों का मत है 
ब्रह्म स्रष्टि से उत्कृष्ट सृजन के हेतु नित्य
कारण यही है पुत्र चरणों में नत है 
क्षिति पर भार सम विचरण व्यर्थ न हो
बीत गया काल वह हो गया विगत है
अब तो प्रभाव दया द्रष्टि का दिखाओ अम्ब
दास भाव युक्त भक्त साधना में रत है

रचनाकार 
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि एवं ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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Agli Sadi

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